संथारा प्रथा क्या है और चर्चित क्यो है ? | santhara pratha kya hai or kyu prachal hai ?|
संथारा प्रथा क्या है और चर्चित क्यो है ? | santhara pratha kya hai or kyu prachal hai ?|
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हम इस post मेें आपके लिए लेकर आए हैं संथारा प्रथा क्या है और चर्चित क्यो है ? | santhara pratha kya hai or kyu prachal hai ?|
जो जन्म लिया है उसकी मृत्यु होना एक शाश्वत सत्य है। नश्वर शरीर के शिथिल होने की स्थिति में जीवन के अंतिम क्षण तक धर्म साधना के साथ जीवन यापन ही 'संथारा' (सल्लेखना) है।
जैन धर्म के पंथ (1. श्वेताम्बर 2. दिगंबर) है। संथारा श्वेताम्बरों में प्रचलित है जबकि दिगंबर इस परम्परा को सल्लेखना कहते है। यह जैन समाज में 1000 वर्ष पुरानी प्रथा है। 297 A.D. में सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य ने श्रावणबेलगोला (कर्नाटक) में सल्लेखना विधि द्वारा ही अपने शरीर का त्याग किये थे।
31 अगस्त, 2015 को उच्चतम न्यायालय ने जैन समुदाय को बड़ी राहत प्रदान करते हुए संथारा प्रथा को प्रतिबंधित करने के राजस्थान हाईकोर्ट के निर्णय पर रोक लगा दी।
10 अगस्त, 2015 को राजस्थान उच्च न्यायालय ने इस प्रथा को आत्महत्या जैसा अपराध बताते हुए प्रतिबंधित कर दिया था।
सती प्रथा आत्महत्या की श्रेणी में आती है, तो संथारा प्रथा को भी इसी श्रेणी का माना जाना चाहिए।
राजस्थान उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायधीश सुनील अम्बवानी और न्यायाधीश वी.एस. सिराधना ने कहा था कि संथारा लेने वालों के खिलाफ IPC (Indian Penal Code) की धारा 306 के अन्तर्गत (आत्महत्या का प्रयास) कार्यवाही क जानी चाहिए।
> जैन समुदाय के लोगों का कहना था कि संविधान के अनुच्छेद 25 के अन्तर्गत प्रत्येक भारतीय को अपने धर्म को अबाध रूप से मानने और उसका आचरण एवं प्रचार कने का अधिकार है।
• बंगलुरू विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति न्यायमूर्ति टी. के. टुकोल ने इस विषय पर एक पुस्तक लिखी है, जिसका शीर्षक- "सल्लेखना इज नॉट सुसाइड " है। "संथारा-ए चैलेंज टू इंडियन सेक्यूलरिज्म" संथारा विषय पर बना एक वृत-चित्र है जिसके निर्देशक प्रोफेसर शेखर हट्टगड़ी है।
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