महालवाड़ी व्यवस्था क्या थी? | mahalvaadi vyvastha kya thi ?|

महालवाड़ी व्यवस्था क्या थी? | mahalvaadi vyvastha kya thi ?|


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महालवाड़ी व्यवस्था-


जमींदारी प्रथा एवं रैयतवाड़ी व्यवस्था के अतिरिक्त देश के कुछ भागों में महालवाडी भूमि व्यवस्था लागू की गई। महाल का अर्थ गांव है। इस व्यवस्था के अन्तर्गत गांव के मुखिया से सरकार का लगान वसूली का समझौता होता था, जिसे महालवाड़ी बंदोबस्त कहा जाता है। इस व्यवस्था का जनक हॉल्ट मैकेंजी को माना जाता है।


1833 ई. में मार्टिन बर्ड तथा जेम्स टॉमसन के बंदोबस्त में यह अपने सबसे बेहतर व्यवस्था तैयार की थी। इसलिए, यह बर्ड योजना के नाम से जानी जाती है। महालवाड़ी व्यवस्था जमींदारी व्यवस्था का ही संशोधित रूप थी।


इसके अनुसार प्रति खेत के आधार पर राजस्व निश्चित नहीं किया गया, बल्कि प्रत्येक महाल (गांव या जागीर) के अनुसार निश्चित किया गया। इसीलिए, यह व्यवस्था महालवाड़ी पद्धति के नाम से जानी जाती है। समस्त महाल सम्मिलित रूप से राजस्व चुकाने के लिए उत्तरदायी था।


 राजस्व वसूली का काम ग्रामप्रधानों या जमींदारों पर छोड़ दिया गया। इस व्यवस्था में कृषक का भूमि पर व्यक्तिगत स्वामित्व नहीं रहता था, बल्कि समस्त महाल (ग्राम) ही भूमि का मालिक था। अगर कोई किसान अपनी भूमि छोड़ देता था तो ग्राम समाज ही उस भूमि की देखभाल करता था।


गंगा घाटी, उत्तर-पश्चिमी प्रांतों एवं भारत के अन्य भागों में यह व्यवस्था लागू की गई। पंजाब में एक संशोधित महालवाड़ी व्यवस्था स्थापित हुई जहा ग्राम-व्यवस्था थी। अवध और अन्य क्षेत्रों में प्रारंभ में यह व्यवस्था 3-4 वर्षों के लिए लागू की गई। इस अवधि मे महालों से वसूल होने वाली लगान की राशि में 25% की बढ़ोतरी की गई। पुन:, 1807 ई. और 1818 ई. के मध्य लगान की राशि में 50% की वृद्धि की गई। 1822 ई. में प्रथम बार औपचारिक रूप से यह व्यवस्था स्थापित की गई। इसके अनुसार जर्मीदारी जागीरों में कृषकों से प्राप्त आमदनी का 83% जमींदारों का सरकार को देना पड़ता था। 1833 ई. में इस व्यवस्था में और सुधार किए गए। अब गांवों को महालों में मिलाकर महाल की लगान निश्चित की गई और उसे विभिन्न गांवों पर (महाल के अंतर्गत आने वाले) बांट दिया गया।


इस योजना को मुख्य रूप से उत्तर-पश्चिमी प्रदेश में व्यवहार में लाया गया। लगान की राशि 2/3 निश्चित की गई। यह व्यवस्था 30 वर्षों के लिए लागू हुई। इस व्यवस्था में लगान की राशि 66% से अधिक रखी गई थी, इसलिए, 1855 ई. में लॉर्ड डलहौजी ने सहारनपुर नियम के अनुसार लगान की राशि 50% निर्धारित की. परंतु इसमें भविष्य की बढ़ोतरी को भी ध्यान में रखा गया। फलस्वरूप, कृषकों पर अतिरिक्त लगान का बोझ बढ़ गया।

 


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