उत्परिवर्तनवाद क्या है?| what is Mutation Theory ?|

उत्परिवर्तनवाद क्या है?|  what is Mutation Theory ?|


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हम इस post मेें आपके लिए लेकर आए हैं उत्परिवर्तनवाद क्या है?|  what is Mutation Theory ?|


उत्परिवर्तनवाद (Mutation Theory):- "Hugo de Vrics" नामक वैज्ञानिक ने सन् 1901 में यह सिद्धान्त दिया। उनके अनुसार नई जाति की उत्पत्ति अचानक एक ही बार में होने वाली स्पष्ट एवं स्थाई (वंशमात) बड़ी विभिन्नता (उत्परिवर्तनों) के कारण होती है। अतः किसी जीव में अचानक परिवर्तन हो जाना उत्परिवर्तन कहलाता है। 

यद्यपि डार्विन ने भी उत्परिवर्तन को देखा था लेकिन उन्होंने इसे महत्त्व नही दिया। वे यही मानते रहे कि छोटी-छोटी विभिन्नताओं के करण हो जीवों में परिवर्तन होत हैं। किंतु कालांतर में वैज्ञानिकों ने उत्परिवर्तन को पर्याप्त महत्त्व दिया तथा इसे ही विकास का आधार माना। इस दिशा में सबसे पहला प्रयास हालैण्ड के वैज्ञानिक यूगो डी-ब्राइज ने किया। उन्होंने 1901 में जैव विकास की प्रक्रिया को उत्परिवर्तन के आधार परसमझाया। जिसे 'डी-वाइज का उत्पाद कहते है।


इस बाद के अनुसार, जीवों का विकास छोटी-छोटी भिन्नताओं के कारण न होकर बड़ी तथा आकस्मिक भिन्नताओं के कारण हुआ है। डी-ब्राइज ने इन बड़ी तथा आकस्मिक भिन्नताओं को उत्परिवर्तन को संज्ञा दी तथा इनसे उत्पन्न संतानों को उत्परिवर्तित (mutants) कहा। इन विभिन्नतायें का कारण कुछ भी हो सकता है। लेकिन विभिन्नताओं वातावरण के कृत्रिम प्रभाव से पैदा न होकर आनुवंशिक पदार्थ में परिवर्तनों के कारण पैदा होती है। जिन जीवों में ये विभिन्नतायें होती है, वातावरण अपने अनुकूल उत्परिवर्तनों को चुन लेता है। लेकिन जो जीव वातावरण के अनुकूल नहीं होते वे नष्ट हो जाते है। इन उत्परिवर्तनों की वंशगति होती रहती है और अंत में नवो प्रजाति का जन्म हो जाता है।


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