नव-डार्विनवाद क्या हैं ? | what is Neo-Darwinism? |

नव-डार्विनवाद क्या हैं ? | what is Neo-Darwinism? |


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हम इस post मेें आपके लिए लेकर आए हैं नव-डार्विनवाद क्या हैं ? | what is Neo-Darwinism? |


नव-डार्विनवाद (Neo-Darwinism) डार्विनवाद सन् 1859 में प्रकाशित हुआ और लगभग 40 वर्षों तक छाया रहा। यह काल डार्विनवाद भावुकता काल (romantic period of Darwinism) कहलाया। परंतु बीसवीं सदी के प्रारंभ में जब कोरेन्स, शेरमाक एवं डी-ब्रिज ने मंडल के सिद्धांतों को पुनः खोज के बाद यह स्पष्ट कर दिया कि जीन्स के कारण होने वाले परिवर्तन वर्शगत होते तबब डार्विनवाद को बहुत धक्का लगा तथा इस पर आविश्वास किया जाने लगा। इस समय को डार्विनवाद का "अज्ञेयवादी काल (agnostic period of Darwinisim) कहते है।


डार्विनवाद की लोकप्रियता कम होने पर डार्विन के समर्थकों ने डार्विनवाद का परिवर्तित एवं नया रूप प्रस्तुत किया, जिससे डार्विनवाद पुनः लोकप्रिय हो गया। डार्विन के समर्थकों द्वारा प्रस्तुत इस नये डार्विनवाद को ही 'नव- डार्विनवाद की संज्ञा दी गयी। बाद में कई अन्य वैज्ञानिकों जैसे मेयर, हैन्सके, हल्दोन, सेवाल, स्टेविन्स तथा फिशर इत्यादि ने नव-डार्विनवाद को (लोकप्रिय बनाने में योगदान दिया। नव- डार्विनवाद के अनुसार, किसी जाति पर कई कारकों का एक सी प्रभाव पड़ता है। जिससे इस जाति से नई जाति बन जाती है। ये कारक है।-


(1) विभिन्नता या विविधता 

(ii) म्यूटेशन या उत्परिवर्तन।

(iii) प्राकृतिक चयन या प्रकृक्तिवरण ।

(iv) जनन यो लैंगिक पृथक्करण | 

इस प्रकार नव डार्विनवाद के अनुसार, जीन्स में साधारण परिवर्तनों के परिणामस्वरूप जीवों की नयी जातियां बनती हैं,जिनमें जीन परिवर्तन के कारण विभिन्नतायें भी बढ़ जाती है।


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