कोलेजियम व्यवस्था में दोष | collegium vyavastha main dosh |

कोलेजियम व्यवस्था में दोष | collegium  vyavastha main dosh | 


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कोलेजियम व्यवस्था में दोष


पहला तर्क है यह सिद्धांत प्राकृतिक न्याय की दृष्टि से ही गलत है। कि खुद न्यायाधीश ही न्यायाधीशों का चयन करें। अगर किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र में सरकार, संसद और न्यायपालिका के बीच शक्तियों का संतुलन होना अच्छा माना जाता है तो वह भारत में क्यों नहीं होना चाहिये? दूसरा तर्क है कि हम इंग्लैंड, अमेरिका या किसी भी विकसित देश को देख लें; हर जगह न्यायिक नियुक्तियों में सरकार या / और संसद की प्रभावी भूमिका होती है तो भारत की न्यायपालिका को यह विशेषाधिकार क्यों होना चाहिये? 

तीसरा तर्क एक आलोचना के रूप में है। वह यह है कि इस प्रणाली के कारण न्यायिक नियुक्तियों में भाई-भतीजावाद बढ़ा है और समाज के वंचित तबकों को हिस्सा नहीं मिल सका है। कुछ आलोचक यहाँ तक कहते हैं कि उच्चतर न्यायपालिका के अधिकांश न्यायाधीश सिर्फ 80-100 परिवारों से आते हैं। 

इस कारण हमारी न्यायपालिका समाज के सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व भी नहीं कर पाती है। यह तथ्य रोचक है कि सुप्रीम कोर्ट में आज तक सिर्फ 6 महिलाएँ न्यायाधीश बन पाई हैं। अनुसूचित जातियों से अभी तक सिर्फ 3 न्यायाधीश बने हैं और अनुसूचित जनजातियों से तो एक भी नहीं।


 
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