42वाँ संविधान संशोधन अधिनियम 1976| 42th constitution amendment act 1976| 42 संविधान संशोधन मै क्या लिखा गया है |
42वाँ संविधान संशोधन अधिनियम 1976
42वाँ संविधान संशोधन मुख्यतः 'सरदार स्वर्ण सिंह समिति' की सिफारिशों को मूर्त रूप था। इसे 'लघु संविधान' भी कहा जाता है क्योंकि इसके माध्यम से संविधान में व्यापक बदलाव किये गए। ऐसे कुछ बदलाव निम्नलिखित हैं- संविधान की प्रस्तावना में तीन नये शब्द जोड़े गए-
'समाजवादी', 'पंथ निरपेक्ष' तथा 'अखण्डता'। अनुच्छेद 31घ को शामिल कर राष्ट्रविरोधी गतिविधियों तथा सम्मेलनों को वर्जित करने वाली विधियों को संविधान के अनुच्छेद 14,19 या 31 के उल्लंघन के आधार पर न्यायिक पुनर्विलोकन से संरक्षण प्रदान किया गया।
- कुछ नए नीति निदेशक तत्त्व शामिल किये गए, जैसे- आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को निःशुल्क कानूनी सहायता," उद्योगों आदि के प्रबंधन में कामगारों की सहभागिता तथा देश के पर्यावरण एवं वन्यजीव के संरक्षण का आदर्श आदि । 48(A) YBA अनुच्छेद 31ग में संशोधन कर यह प्रावधान किया गया कि भाग 4 में शामिल किसी भी नीति निदेशक तत्व के पक्ष में
- संसद द्वारा बनाई गई विधियों को मूल अधिकारों से संबंधित अनुच्छेद (14,19या 31 ) के उल्लंघन के आधार पर न्यायालय में प्रश्नगत नहीं किया जा सकता।
- संविधान में भाग-4 के तहत एक नया अनुच्छेद 51क जोड़कर नागरिकों के मूल कर्त्तव्य निर्धारित किये गए। यह संकल्पना (मूल कर्तव्य) सोवियत संघ (पूर्व) के संविधान से प्रेरित हैं।
- अनुच्छेद 74 (1) को संशोधित कर स्पष्ट कर दिया गया कि राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और उसकी मंत्रिपरिषद् की सलाह के अनुसार कार्य करेगा।
- आपातकाल की स्थिति में लोकसभा तथा राज्य विधान सभाओं की समयावधि को 5 वर्ष से बढ़ाकर 6 वर्ष कर दिया गया। इसके साथ ही संसद व राज्य विधान सभाओं की संयुक्त बैठक बुलाने से संबंधित आवश्यक गणपूर्ति संबंधी प्रावधान समाप्त कर दिया गया।
- अनुच्छेद 257 को संविधान में शामिल कर केंद्र सरकार को यह शक्ति दी गई कि वह विभिन्न राज्यों में जहाँ कानून और व्यवस्था से संबंधित गंभीर परिस्थितियाँ उत्पन्न हो गई हैं, वहाँ सशस्त्र बलों की तैनाती कर सकेगा।
- अनुच्छेद 352 एवं अनुच्छेद 356 में संशोधन कर राष्ट्रपति को संपूर्ण देश के लिये एक साथ या देश के किसी भाग में आपात उदघोषणा जारी करने की शक्ति दी गई एवं राज्य में संवैधानिक तंत्र की विफलता के आधार पर लगे राष्ट्रपति शासन की अवधि 6 माह से बढ़ाकर 1 वर्ष करने की शक्ति संसद को दी गई।संविधान के अनुच्छेद 368 में दो नए खंड 368 (4) तथा 368 (5) शामिल कर संसदीय सर्वोच्चता को सुनिश्चित करते हुए संसद को शक्ति दी गई कि वह अनुच्छेद 368 से संबंधित संशोधन की प्रक्रिया द्वारा संविधान के किसी भी उपबंध का संशोधन कर सकती है जिसे न्यायालय में प्रश्नगत नहीं किया जा सकता।
- सातवीं अनुसूची में परिवर्तन कर राज्य सूची में कुछ नई प्रविष्टियाँ शामिल की गई एवं कुछ प्रविष्टियों, जैसे-शिक्षा, नाप-तौल, वन आदि को समवर्ती सूची में स्थानांतरित किया गया।
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