44वाँ संविधान (संशोधन) अधिनियम 1978 | 44th constitution amendment act 1978|

44वाँ संविधान (संशोधन) अधिनियम 1978



संपत्ति के अधिकार से संबंधित अनुच्छेद 19(1) (च) एवं अनुच्छेद 31 को मूल अधिकारों से हटा दिया गया जिसे एक नए अनुच्छेद 300क के माध्यम से कानूनी अधिकार बना दिया गया।

अनुच्छेद 22 के अंतर्गत निवारक निरोध में संशोधन कर राज्य द्वारा किसी भी व्यक्ति को निरूद्ध करने व रखने के अधिकारों को सीमित कर दिया गया। यह संशोधन व्यवहार में लागू नहीं हो सका क्योंकि जनता पार्टी सरकार गिर गई थी।

अनुच्छेद 71 को संशोधित कर राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के निर्वाचन से संबंधित विवादों की जाँच करने का अधिकार पुनः सर्वोच्च न्यायालय को सौंप दिया गया (39वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1975 द्वारा यह अधिकार छीन लिया गया था)।

अनुच्छेद 74(1) में संशोधन कर राष्ट्रपति को शक्ति दी गई कि मंत्रिपरिषद् द्वारा दी गई सलाह को पुनर्विचार के लिये एक बार लौटा सकता है. परंतु उसके बाद इस सलाह को मानने के लिये राष्ट्रपति बाध्य होगा।

लोक सभा एवं राज्य विधान सभा के कार्यकाल को पुनः 5 वर्ष कर दिया गया। संविधान के अनुच्छेद 352 356 358. 359 और 360 में उल्लेखित आपात उपबंधों से संबंधित प्रावधानों में निम्नलिखित परिवर्तन किये गए:

 अनुच्छेद 352 में राष्ट्रीय आपात की उद्घोषणा के आधार.. में से आंतरिक अशांति के स्थान पर सशस्त्र विद्रोह को आधार बनाया गया। अनुच्छेद 359 को आधार पर अनुच्छेद 20 और 21 को निलम्बित नहीं किया जा सकेगा।

किसी राज्य में संवैधानिक तंत्र की विफलता की स्थिति में संसद द्वारा उस राज्य में अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शांसन घोषित करने का प्रस्ताव एक बार में 6 माह से अधिक के लिये प्रवर्तनीय नहीं होगा।

अनुच्छेद 352 के अंतर्गत घोषित राष्ट्रीय आपात को न्यायिक समीक्षा के दायरे में ला दिया गया जिसे 38वें संविधान संशोधन के माध्यम से न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर रखा गया था।





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