कृत्रिम वर्षा क्या है | kratim varsha kya hai | what is Aritficial Precipation |
कृत्रिम वर्षा क्या है | kratim varsha kya hai | what is Aritficial Precipation |
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• कृत्रिम वर्षा (Aritficial Precipation)
इसका तात्पर्य वस्तुतः उस प्रक्रिया में है, जिसमें एक विशेष प्रकार के मेघों को संतृप्त करके वर्षा कराई जाती है।
वर्षा को बादलों का कृत्रिम यौजारोपण भी कहा जाता है। ● सर्वप्रथम वर्ष 1946 ई. में अमेरिकी वैज्ञानिक विसेंट जे. शेफर एवं झविंग गम्पूर ने ठोस कार्बनडाइऑक्साइड का में छिड़काव कर अतिशीतलित मेघों के कृत्रिम बीजारोपण में सफलता प्राप्त की। चूंकि यह अत्यन्त खर्चीली विधि भी इनसे बहुत सीमित मात्रा में हो कृत्रिम वर्षा की प्राप्ति संभव हो सकी। अतः पूर्ण रूप से सफल नहीं हो सका।
इस विधि की असफलता के बाद 1946 ई. में ही वैज्ञानिक बी. जॉनगुट ने सिल्वर आयोडाइड (Agi) विधि द्वारा कृषिम वर्षा कराने हेतु प्रयास किया। बी. बॉनगुट के अनुसार बहुत ऊंचे तापमान पर गर्म करने पर सिल्वर आयोडाइड हो जाता है एवं शीतल होने पर इनसे सिल्वर आयोडाइड के अत्यन्त सूक्ष्म कणों का निर्माण हो जाता है, जो धुएँ के रूप में अति शीतल जल कणों से निर्मित मेघों में जमा हो जाते हैं। सिल्वर आयोडाइड के अत्यन्त सूक्ष्म कण SC में नि तापमान पर अति सूक्ष्म नाभिकों का कार्य करते है जिन पर हिमकणों का निर्माण होता है। इस प्रकार से मेघों को हिमकणों से निर्मित मेघों में परिवर्तित कर देते है।
सिल्वर आयोडाइड के सूक्ष्म क्रिस्टलों का निर्माण करने के लिए इसे एसीटोन नामक अति ज्वलनशील तरल पदार्थ में गर्न किया जाता है उसके बाद सिल्चर आयोडाइड के सूक्ष्म कण मेघों में पहुँचाये जाते है।
* कृत्रिम वर्षा को यह विधि अपेक्षाकृत कम महंगी होती है क्योंकि इस विधि में सिल्चर आयोडाइड की थोड़ी मात्रा का हो प्रयोग किया जाता है।
4 सिल्वर आयोडाइड से कृत्रिम वर्षों केवल उन्हीं मेघों में प्रभावशाली है जिनमें प्राकृतिक रूप से वृष्टि की संभावना विद्यमान है। धरातल से 1-2 किमी. की ऊंचाई पर विद्यमान गहरे भूरे मेघों से ही कृत्रिम वर्षा संभव है। सिल्वर आयोडाइटी मेघों की मोटाई 1500 मोटर या उससे अधिक होनी चाहिए एवं सापेक्षिक आर्द्रता कम से कम 30 से 65 प्रतिशत होन आवश्यक है।
* इनके अतिरिक्त अन्य विधियों से भी कृत्रिम वर्षा कराने का प्रयास किया जा रहा है जिसमें बादलों में विद्युत तरंगों एव प्रघाती तरंगों द्वारा विद्युत आवेशन उत्पन्न कर वर्षा कराना शामिल है। यह विधि सैद्धांतिक रूप से अत्यन्त उपयोगी साबित हो सकती है क्योंकि कपासो वर्षों मेघों में बिजली की चमक के तत्काल बाद वर्षा प्राप्ति होती है। इसके अतिरिक्त वायुयानों द्वारा बादलों में जल छिड़काव की प्रक्रिया द्वारा उसे संतृप्तावस्था में लाकर वर्षा कराना अन्य विधि के रूप में प्रियोग किया जा सकता है।
इजराइल व रूस में कृत्रिम वर्षा हेतु सफल प्रयास किये गये है। भारत में गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र में प्रोजेक्ट रेनड्रॉप बालार गए थे परन्तु यह अधिक सफल नहीं हो सका।
कृत्रिम ढंग से वर्षा कराने के लिए किए गए प्रयासों की सफलता सदैव विवादस्पद रही है। प्रारम्भ में अनेक व्यावसायिक प्रतिष्ठानों ने दावा किया कि मेघों के कृत्रिम बीजारोपण से वृष्टि की मात्रा में कई सौ प्रतिशत की वृद्धि सम्भव है, किन्तु वैज्ञानिकों ने ऐसे दावे निराधार सिद्ध कर दिए। उनके अनुसार वृष्टि को मात्रा में वृद्धि अधिक-से-अधिक 10 से 20 प्रतिशत हो सकती है। सटन ने इस सम्बन्ध में अपना स्पष्ट मत व्यक्त किया है कि भरावल से छोड़े गए सिल्वर आयोडाइड के द्वारा विस्तृत क्षेत्रों की दृष्टि में अधिक मात्रा में वृद्धि के संतोषजनक प्रमाण नहीं मिलते।
चीन ने कृत्रिम वर्षा की प्रणाली को सर्वाधिक प्रोत्साहन दिया है। इनका विश्वास है कि सिल्वर आयोडाइड रॉकेटों के लो माध्यम से शुष्क प्रदेशों में वर्षा की मात्रा को बढ़ाया जा सकता है। चीन की योजना है कि 2008 में होने वाले ग्रीष्मकालीन ओलम्पिक के समय मेघ बीजारोपण के माध्यम से वर्षा को रोक सके ताकि मेडल समारोह में कोई बाधा न पड़े। रूस में सैनिक पायलेट के द्वारा मंघ बीजारोपण की क्रिया से बेलारस में चेनॉवेल आपदा से उत्पन्न रेडियोधमय पदार्थों को मास्को को तरफ आने से रोकने का प्रयास किया दक्षिण एशिया में भी मेक बीजारोपण की प्रक्रिया से वर्षा की मात्रा को बढ़ाने के प्रयास किए गए
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