राज्य सभा की प्रासंगिकता | rajya sabha ki praasangikta |

राज्य सभा की प्रासंगिकता | rajya sabha ki praasangikta |


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राज्य सभा की प्रासंगिकता


• अगर राज्य सभा के पहले ही सत्र में उठाए गए मुद्दों पर ध्यान दें तो उसमें पारिस्थितिकी, नदियों की सफाई, जनसंख्या वृद्धि, नौकरशाहों को संवेदनहीनता, रेलवे जोन, जल के पारंपरिक स्रोत और उन्हें संरक्षित करने के तरीके जैसे अत्यंत संवेदनशील मुद्दों पर हुए विचार-विमर्श इसे 'विचारों के सदन' के रूप में स्थापित करते हैं।


• इसके बाद के सत्रों में भी राज्य सभा ने महिलाओं की समस्या, विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, समान कार्य के लिये समान वेतन, बंधुआ मज़दूरी के उन्मूलन जैसे मुद्दों को उठाया।


• महिला सशक्तीकरण से संबंधित कई विधेयक राज्य सभा में ही प्रस्तावित किये गए। हिन्दू विवाह तलाक विधेयक, 1952; हिन्दू माइनॉरिटी एंड गार्जियनशिप बिल, 1953; हिन्दू उत्तराधिकार विधेयक, 1954; हिन्दू एडॉप्शन एंड मेंटनेंस बिल, 1956; 'द मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेगनेंसी बिल', 1969 जैसे कई विधेयक राज्य सभा में ही प्रस्तावित किये गए।

 यहाँ तक कि लोक सभा एवं राज्य विधानसभा की सीटों में महिलाओं के लिये 33 प्रतिशत आरक्षण का प्रस्ताव भी सर्वप्रथम राज्य सभा से ही पारित हुआ। ऐसे कई विधेयक एवं संशोधन हैं जिनमें राज्य सभा के सदस्यों ने अपनी बुद्धिमत्ता एवं दूरदर्शिता का परिचय दिया और राज्य सभा के महत्त्व एवं उसकी प्रासंगिकता को सिद्ध किया है।

• इसके अलावा, राज्य सभा एक स्थायी सदन भी है। लोक सभा का विघटन होने के बाद भी राज्य सभा अपना कार्य करती रहती है।

• 1977 में जब तमिलनाडु तथा नागालैंड में राष्ट्रपति शासन लगाया गया था और लोक सभा पहले ही विघटित हो गई तो निर्धारित अवधि के भीतर राज्य सभा में ही इस पर संस्तुति दी गई। इसलिये संवैधानिक दृष्टिकोण से भी राज्य सभा एक महत्त्वपूर्ण निकाय के रूप में स्थापित होती है।

• अनुच्छेद 249 के अनुसार, अगर राष्ट्रहित में राज्य सूची के किसी विषय पर कानून बनाना आवश्यक है तो राज्य सभा विशेष बहुमत से प्रस्ताव पारित करके संसद को उस विषय पर कानून बनाने के लिये प्राधिकृत कर सकती है। 1986 में इसके इस्तेमाल से पंजाब में आतंकवाद की समस्या से निपटने के लिये संसद कानून बनाने में समर्थ हुई।

• अनुच्छेद 312 के अतंर्गत राज्य सभा को शक्ति दी गई है कि वह उपस्थित और मतदान करने वाले दो-तिहाई सदस्यों के समर्थन से कोई नई अखिल भारतीय सेवा या सेवाएँ स्थापित करने का अधिकार संसद को दे सकती है।
 
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