भारतीय विश्वविद्यालय अधिनियम 1904 | bhartiye विश्वविद्यालाय adhiniyam 1904 |
भारतीय विश्वविद्यालय अधिनियम 1904 | bhartiye विश्वविद्यालाय adhiniyam 1904 |
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भारतीय विश्वविद्यालय अधिनियम 1904-
1904 ई. में टॉमस रैले आयोग की सिफारिशों के मद्देनजर भारतीय विश्वविद्यालय अधिनियम पारित किया गया।
मुख्य प्रावधान
1. तीनों पुराने विश्वविद्यालयों के संगठन में परिवर्तन हुए। सीनेट के सदस्यों की संख्या कम-से-कम 50 और अधिक-से-अधिक 100 निश्चित की गई। नए विश्वविद्यालयों के लिए यह संख्या क्रमशः 40 व 75 की गई। सदस्यों की कार्यावधि 6 वर्षों के लिए रखी गई। इसी प्रकार, सिंडिकेट के निर्वाचित सदस्यों की संख्या कलकत्ता, बंबई और मद्रास विश्वविद्यालयों में 20 और अन्य जगहों पर 15 कर दी गई।
2. कॉलेजों को विश्वविद्यालयों से संबंधित करने का अधिकार सरकार के नियंत्रण में रहा। इसी प्रकार, प्राध्यापकों की नियुक्ति एवं नीति-निर्धारण पर भी सरकारी नियंत्रण स्थापित हो गया।
3. विश्वविद्यालयों को यह आदेश दिया गया कि वे अध्यापन तथा शोध के लिए प्राध्यापकों को नियुक्त करें, प्रयोगशालाएं और पुस्तकालय स्थापित करें, विद्यार्थियों की शिक्षा का भार स्वयं लें।
4. सरकार को सीनेट द्वारा प्रस्तावित विषयों पर निषेध लगाने, प्रस्तावों में संशोधन एवं परिवर्तन करने तथा नए नियम बनाने का भी अधिकार दिया गया।
5. विश्वविद्यालयों की क्षेत्रीय सीमाएं निश्चित करने का अधिकार गवर्नर जनरल को दिया गया। कर्जन द्वारा पारित भारतीय विश्वविद्यालय अधिनियम की आलोचना हुई। एक आलोचक के शब्दों में इस अधिनियम से भारतीय विश्वविद्यालय विश्व में सबसे अधिक पूर्णतया सरकारी विश्वविद्यालय बन गए।
इस अधिनियम के राष्ट्रवादी तत्वों की आलोचना की गयी। कर्जन की इस नीति के परिणामस्वरूप ही विश्वविद्यालयों के सुधार के लिए प्रतिवर्ष 5 लाख रुपये 5 वर्ष तक के लिए व्यवस्था की गई।
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