हजरत मुहम्मद साहब | hajrat mohommad sahaab | muslim god |

हजरत मुहम्मद साहब | hajrat mohommad sahaab | muslim god |


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               हजरत मुहम्मद साहब


मुहम्मद का शाब्दिक अर्थ प्रशस्त होता है। हजरत मुहम्मद साहब का  उत्तरी अरब के जन्म शहर मक्का में 29 अगस्त 570 ई. में कुर्रायश कबीले के सबसे कुलीन वंश बनू हाशिम में हुआ था।

उस समय का मक्का न सिर्फ व्यापार का केंद्र था, बल्कि प्राचीन पवित्र स्थान काबा भी मक्का शहर मे ही था। इस कारण से वहां आसपास के सभी देशों के व्यापारी और तीर्थ यात्री आते थे।

मुहम्मद साहब के पिता अब्दुल्ला का देहांत उनके पैदा होने से पहले व उनकी माता आमिना का देहांत (जब वे मात्र 6 वर्ष की थी) जन्म के बाद हो गया था। | उनके चाचा अबू तालिब ने ही उनका पालन पोषण किया। जिस कारणसे मक्का के लोगो ने उनको अल अमीन का नाम भी दिया जिसका अर्थ भरोसेमंद ईसान है। 25 वर्ष की आयु में उनकी शादी खदिजा से हुई, जो उनके कार्यों से बेहद प्रभावित थी। मुहम्मद साहब ज्यादातर समय शहर से थोडी दूर हिरा नाम की एक गुफा में आध्यात्मिक चिंतन करते व्यतीत हुआ। 610 ई. मे उन्हें पहली बार ईश्वरीय अनुभूति हुई। उनकी पत्नी खदिजा थी। जिन्होने उन्हे सबसे पहले पैगंबर के रूप में पहचाना। वे अपने अंतिम समय तक मुहम्मद साहब के मिशन का स्तंभ बन कर रही। मुहम्मद साहब जीवन की इस अनोखी शुरूआत के बाद 23 वर्ष जीवित रहे। 

मशहूर अमेरिकी लेखक माइकल हार्ट ने 'द-100' नामक पुस्तक में उन्हे | विश्व के 100 अत्यंत कामयाब लोगो की सूची में पहले स्थान पर रखा। जब मक्का के लोगो ने मुहम्मद साहब और उनके साथियों का जीवन बहुत कठिन कर दिया, तब उन्होने मक्का से 280 मील दूर स्थित मदीना जाने का निर्णय लिया।

 उस समय रेगिस्तान में 280 मील का यात्रा आसान नही थी। मुश्किलों के बाद वे मदीना पहुंचे जहां लोगो ने उनका हार्दिक स्वागत किया। वहां उन्होने किसी समस्या की बजाय सिर्फ ईश्वर शांति व भाई चारे की बात की थी। मुहम्मद साहब | के एक साथी अबू जर गफ्फरी के अनुसार उन्होने किसी पर कभी भी अपमानजनक | टिप्पणी नही करने की सलाह दी थी। मुहम्मद साहब जब मदीना के शासक बन चुके थे।

मुहम्मद साहब की शिक्षाएँ -

मुहम्मद साहब ने इस्लाम धर्म के मानने वालों के लिए जीवन में 5 सिद्धान्त निर्धारित किए।

1. कलमा: अल्लाह एक है और मुहम्मद उसके पैगम्बर है।

2. नमाजः प्रतिदिन 5 बार नमाज पढ़ना। 

3. रमजानः रमजान के पवित्र महीने में रोजा (व्रत) रखना।

4. जकातः अपनी उपार्जित आय का 2% गरीबों को दान करना। 

5. हजः पूरे जीवन में एक बार मक्का की तीर्थयात्रा करना ।


 
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