ब्रिटिश सरकार द्वारा महिलाओं के लिए किए गए कार्य | british sarkaar dwara mahilao ke liy kiy gay karya |

ब्रिटिश सरकार द्वारा महिलाओं के लिए किए गए कार्य | british sarkaar dwara mahilao ke liy kiy gay karya | 

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19वीं सदी में समाज सुधार को केन्द्र महिला एवं दलित रहे इस काल में महिला के उत्थान के लिए जहाँ कुछ शैक्षिणिक प्रयास हुये वहीं दूसरी तरफ कई कानून भी निर्मित किये गये। प्रमुख कानूनों का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है


सती प्रथा रोकथाम अधिनियम 1829- लार्ड विलियम बैटिक के समय 1829 में नियम 17 के लहत सती प्रथा को प्रतिबंधित कर दिया गया। सती प्रथा पर प्रतिबंध पहले केवल बंगाल में था लेकिन कालांतर में यह प्रतिबंध बम्बई और मद्रास लागू हो गया। इस कानून के तहत किसी महिला को सती होने के लिए प्रेरित करने पर सजा का प्रावधान था। 

शिशु बालिका वध रोकथाम कानून- शिशु वध की प्रथा 13वीं सदी में राजपूतों और बंगालियों में प्रचलित थी। 1785 के बंगाल नियम 21 और 1804 के नियम द्वारा इस क्रूर अमानवीय प्रथा को समाप्त करने का प्रयास किया गया। 

विधवा पुनर्विवाह अधिनियम 1856- विधवा पुनर्विवाह की स्थिति में सुधार लाने के लिए ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने ,अथक प्रयत्न किया। 1856 में विद्यासागर ने ब्रिटिश सरकार से विधवा पुनर्विवाह पर कानून बनाने का अनुरोध किया। 1856 के 'विधवा पुनर्विवाह अधिनियम' द्वारा विधवा विवाह को वैध करार देते हुए इनसे पैदा होने वाले बच्चों को वैध माना गया।

सिविल मैरिज एक्ट 1872 -1872 में केश्वचन्द्र सेन के प्रयासों से ब्रिटिश सरकार ने नेटिव मैरिज एक्ट (सिविल मैरिज एक्ट) द्वारा अन्तर्जातीय विवाह को मान्यता प्रदान कर दी गई, साथ ही बाल विवाह का विरोध किया गया।

एज ऑफ कंसेट एक्ट 1891- 1891 में ब्रिटिश सरकार ने एस.एस. बंगाली के सहयोग से 'एज ऑफ कंसेट एक्ट' पारित किया जिसके अनुसार 12 वर्ष से कम आयु की कन्याओं के विवाह पर प्रतिबंध लगा दिया गया तिलक ने 'एज ऑफ कंसेट एक्ट' का विरोध करते हुए इसे भारतीय सामाजिक मामलों में विदेशी हस्तक्षेप माना।

शारदा एक्ट 1930- 1930 में एज ऑफ कंसेट एक्ट(1891) को संशोधित कर शारदा एक्ट नाम दिया गया जिसके अंतर्गत विवाह की आयु को 14 वर्ष (लड़की) और 18 वर्ष (लड़के) निर्धारित किया गया। इस प्रकार उपरोक्त कानूनों के माध्यम से महिलाओं की स्थिति में परिवर्तन लाने का सार्थक प्रयास किया गया।



 
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