संविधान की नकारात्मक विशेषताएं | samvidhan ki nakaratmak visheshtaayen |


संविधान की नकारात्मक विशेषताएं - 



1. भारतीय संविधान अत्यधिक लम्बा, विस्तृत तथा विश्व का सबसे बड़ा संविधान है। संविधान के कुछ अनुच्छेदों का उपयोग अभी तक नहीं हो पाया है। जबकि कुछ धाराओं का समावेश यह सोच कर किया गया कि वे आधारभूत महत्व के है और इस कारण सामान्य व्यवस्थापन के स्तर पर उनको छोड़ना नहीं चाहिए।

2. कुछ आलोचकों का मत है कि संविधान का निर्माण करने वाली संविधान सभा वयस्क मताधिकार के सिद्धान्त पर निर्वाचित नहीं हुई थी और उसे संप्रभु संस्था भी नहीं कहा जा सकता। यह संविधान सभा कॅबिनेट मिशन योजना के आधार पर गठित की गयी थी और इसका गठन ब्रिटिश संसद द्वारा किया गया था।

3. भारतीय संविधान को वकीलों का स्वर्ग माना गया है। संविधान दुर्बोध अस्पष्ट एवं जटिल भाषा से युक्त है। संविधान के विभिन्न उपबन्धों को विस्तृत एवं असंदिग्ध भाषा में लिपिबद्ध किया गया है। इसमें प्रयुक्त भाषा न्यायालय की भाषा है। भारत के सामान्य नागरिको के लिए संविधान को समझना कठिन है। इस संविधान को विधि विशेषज्ञ ही समझ सकते है।

4. भारतीय संविधान ने केंद्र को आवश्यकता से अधिक शक्तिशाली बना दिया है। आलोचकों का कहना है कि भारत के संविधान के द्वारा अधिकार केंद्रीय सरकार को सौप दिये गये है और राज्य की स्थिति नगरपालिकाओं के जैसी हो गयी है। भारत के राष्ट्रपति द्वारा राज्यों के राज्यपालों की नियुक्ति, एकीकृत न्याय व्यवस्था, इकहरी नागरिकता, अखिल भारतीय सेवाएं तथा राष्ट्रपति की संकटकालीन शक्तियाँ हमारे संविधान के प्रमुख एकात्मक लक्षण है।

5. भारतीय संविधान के अधिकांश प्रावधान 1935 के अधिनियम से लिया गया है तथा अन्य प्रावधान विदेशी संविधान से लिए गए हैं. इन आदर्शों और प्रावधानों का भारत की मूल भावना से कोई प्रत्यक्ष सम्बन्ध नहीं है।

6. जिस समय भारत का संविधान लागू किया गया था, उस समय इसमें 395 अनुच्छेद एवं 8 अनुसूचियां थी, जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान में केवल 7, कनाडा के संविधान में 147, अफ्रीका के संविधान में 253 तथा ऑस्ट्रेलिया के संविधान में 128 अनुच्छेद है।



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