ब्रिटिश आर्थिक नीतियों का आलोचनात्मक वर्णन | british arthik nitiyon ka aalochanatmak vardaan |

ब्रिटिश आर्थिक नीतियों का आलोचनात्मक वर्णन | british arthik nitiyon ka aalochanatmak vardaan |


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भारत में 18वीं शताब्दी के मध्य से स्वतंत्रता तक अंग्रेजों की आर्थिक नीतियों के विभिन्न पक्षों का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए।


उत्तर- अंग्रेजों का भारत में आगमन, व्यापार के माध्यम से अत्यधिक आर्थिक लाभ कमाना था। आर्थिक लाभ अर्जित करने के क्रम में वे व्यापारी से शासक बन गए। यह विस्तार उन्होंने भारत में विभिन्न वित्तीय चरणो में में पूरा किया।


पहला चरण व्यापारिक पूँजीवाद के रूप में 1757-1813 ई. तक चला, जिसके अंतर्गत ब्रिटिश आर्थिक नीतियों में भू-राजस्व नीति के तहत् कर के माध्यम से लाभ, तो दूसरी ओर नकदी फसलों अर्थात् चाय, कपास, नील आदि की कृषि पर जोर दिया। इन नीतियों से व्यापार संतुलन तो मातृदेश इंग्लैण्ड बना रहा, किन्तु भारत में किसानों का शोषण हुआ तथा अकाल में बारंबारता आई।


दूसरा चरण औद्योगिक पूंजीवाद का था, जो कि 1813 ई. के बाद मुक्त व्यापार नीति लागू होने के बाद शुरू हुआ । औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप वहाँ के उत्पादों को भारत में बेचने के क्रम में यहाँ के हस्तशिल्प उद्योगों का पतन हो गया। इसी क्रम में रेलवे का विकास हुआ जो कि भारत में बाजार का विस्तार औद्योगिक वस्तुओं के विक्रय लाभ के लिए हुआ ।


तीसरा चरण वित्तीय पूँजीवाद का था जिसमें धन की निकासी के सिद्धांत द्वारा दादाभाई नौरोजी ने जाहिर किया कि किस प्रकार व्यापारिक संतुलन, राजस्व, रेल, कच्चे माल का निर्यात, कंपनी के अधिकारियों, सैनिकों के वेतन-भत्ते आदि देने के क्रम में धन निकासी हुई।


उपरोक्त आर्थिक नीतियों से जहाँ इंग्लैण्ड का अधिकतम आर्थिक लाभ हुआ, वहीं इनकी नीतियों से भारतीय कृषि अर्थव्यवस्था गाँव तक शोषित हुई, हस्तशिल्पकारों का संरक्षण समाप्त हुआ, जिससे उनका पतन हुआ, कच्चे मालों का इंग्लैण्ड से कम 'कीमत में निर्यात से संसाधनों का निष्कासन हुआ। वस्तुतः विश्व अर्थव्यवस्था से भारत पहले भी जुड़ा था और अंग्रजों के शासन के दौरान भी, किन्तु अब भारतीय अर्थव्यवस्था असंतुलित तथा दुर्दशा का शिकार हो चुका था।



 
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