मौर्यकालीन समाज | moryakaleen samaaj |

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मौर्यकालीन समाज


कौटिल्य के अनुसार वर्णव्यवस्था ही सामाजिक संगठन का आधार है। अतः प्रत्येक वर्ण की स्थिति व उनके कर्तव्यों का विवरण अर्थशास्त्र में दिया गया है। वर्णव्यवस्था की रक्षा करना राजा का प्रमुख कर्तव्य था ।

वर्णव्यवस्था भंग होने से संपूर्ण सामाजिक व्यवस्था नष्ट हो जाती, जिसका प्रभाव | राज्य के अस्तित्व पर भी पड़ता। इसलिए, सामाजिक व्यवस्था नष्ट हो जाती, जिसका प्रभाव राज्य के अस्तित्व पर भी पड़ता। इसलिए, राजा को वर्णाश्रमधर्म की स्थापना की सलाह दी गई। 4 वर्णों के व्यवसाय निर्धारित थे, जिनका पालन करना उनके लिए आवश्यक था।

ब्राह्मणों (शिक्षकों, पुरोहितों, वेद का पाठ करने वालों, यज्ञ कराने वालों) को | राज्य की ओर से करमुक्त भूमि दान में दी जाती थी, जिसे ब्रह्मदेव कहा जाता था।

मौर्ययुग में ही नई स्थापित बस्तियों में शूदों को प्रथम बार भूमि भी दी गई।शूद्रों की स्थिति में परिवर्तन का प्रमाण इस बात से भी लगता है कि अर्थशास्त्र में शूद्र को आर्य कहा गया है और उसे म्लेच्छ से भिन्न माना गया है।

 अर्थशास्त्र में 15 मिरित जातियों का भी उल्लेख हुआ हैं इन्हें अंतवासिन कहा गया है। इनकी उत्पत्ति अनुलोम व प्रतिलोम विवाहों के कारण हुई थी।



 
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